गुरु गोविंद दोनों खड़े, काके लागूं पाँय ।
बलिहारी गुरु आपनो, गोविंद दियो मिलाय ॥

कबीर कहते हैं की गुरु का स्थान ईश्वर से भी ऊपर है. यदि दोनों एक साथ खड़े हो तो किसे पहले प्रणाम करना चाहिए. किन्तु गुरु की शिक्षा के कारण ही भगवान् के दर्शन हुए हैं.



बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय,
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।

जब मैं इस संसार में बुराई खोजने चला तो मुझे कोई बुरा न मिला. जब मैंने अपने मन में झाँक कर देखा तो पाया कि मुझसे बुरा कोई नहीं है.




श्री ञिलोक पुरी जी महाराज


          भारतीय संस्कृति अपनी अनेक विशेषताओ के कारण सभ्यता और संस्कृति के इतिहास में सवौच्च है। इस संस्कृति की सबसे बडी विशेषता दूसरो के दुख मे सहभागिता है।वस्तुतः हमारी संस्कृति का मूलधार ही यही भावना है।अपने सुख और दुखों की लाभ हानि की चिंन्ता किये बिना दूसरो के दुःखो को दूर करने के लिय संत पुरषो ने अपने जीवन को समृपित किया।संतो का साधारण मनुष्यो की तरह अपना जीवन नही होता।उन्हे किसी वस्तु ओर धन की कामना नही होती अपितु वे निःस्वाथ भाव से दीन दुःखियो की सेवा करते है।गोस्वामी तुलसीदास जी श्री राम चरिञ मानस के आरम्भ मे गुरु की वन्दना करते हुए लिखते हैः-मै गुरु महाराज के चरण-कमल की रज को प्रणाम करता हूँ जो अच्छी और प्रेम को उत्पञ करने वाली सुगनि्धत और सारसहित है।

           जैसे ज्ञान विज्ञान के बिना मोश्र नही हो सकता उसी तरह सतगुरु से सम्बन्ध हुए बिना ज्ञान की प्राप्ति नही हो सकती। गुरु माली है और शिष्य पेङ ।गुरु शिष्य को एक समय एक सि्थति और एक हद तक सींचता है। गुरु माञ जड़ ही नही देता बलि्क उन जड़ो को विस्तार भी प्रदान करता है गुरु शिष्य को पेङ की तरह देने की,बाँटने की, झुकने की कला सिखा देते है। गुरु परमात्मा और आत्म के बीच का बाँध है और माध्यम है। गुरु माला की वह डोर है जिसके सहारे शिष्य प्रभु के गले में लिपटा रहता है। शिष्य वग के लिय गुरु की हर हरकत हर कि्या- प्रतिकि्य भलाई के लिय होती है। गुरु का हर इशार हर कदम महत्वपूण होता है। उनसें कोइ सीख छिपी होती है।


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